अलाउद्दीन के सेनापतियों में गयासुद्दीन तुगलक या गाजी मलिक तुगलक वंश का प्रथम शासक था। उसने तुगलक वंश की स्थापना की। गयासुद्दीन तुगलक अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में कई महत्वपूर्ण अभियानों का अध्यक्ष था तथा उसे दीपालपुर का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। अनेक अवसरों पर उसने मंगोलों के विरुद्ध युद्ध किया, उन्हें भारत से बाहर खदेड़ा, इसलिए वह ‘मलिक-उल-गाजी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
खुसरो शाह को समाप्त करके उसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लिया तथा 8 सितंबर, 1320 ई. को सुल्तान बना। इसका एक नाम गाजी बेग तुगलक या गाजी तुगलक भी था, इसी कारण इतिहास में उसके उत्तराधिकारियों को भी ‘तुगलक’ पुकारा जाने लगा और उसका वंश तुगलक वंश कहलाया।
ग्यासुद्दीन तुगलक ने 1320 ई. में नासिरुद्दीन खुसरव की हत्या करके तुगलक वंश की स्थापना की यह उस समय लाहौर के निकट दीपालपुर का गवर्नर था। गाजी मलिक का दूसरा नाम ग्यासुद्दीन तुगलक था गाजी का अर्थ होता है – “काफिरों का संहारक” (जो धर्म नहीं मानते उनकी हत्या करने वाला)।
दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाला यह तीसरा वंश था। गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के निकट तुगलकाबाद नामक नगर की स्थापना की।
गयासुद्दीन के पुत्र का नाम जौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) था, जिसे उलूग खाँ की उपाधि प्रदान की गयी।
फरिश्ता के अनुसार, गाजी मलिक के पिता कुतुलुग गाजी थे बाद में कुतुलुग शब्द अपभ्रंश होते-होते तुगलक हो गया और ये अपने नाम के आगे तुगलक लिखने लगे। ग्यासुद्दीन तुगलक पहला ऐसा सुल्तान था जिसने सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण कराया, डाक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। ग्यासुद्दीन तुगलक ने असैनिक पदाधिकारियों को जागीर देने की प्रथा पुन: शुरु की।
अमीर खुसरो के अनुसार, ग्यासुद्दीन तुगलक एक विद्वान शासक था। गयासुद्दीन के समय में दिल्ली सल्तनत के आय के स्रोत निम्न थे।
कर प्रणाली :
जजिया – यह ग़ैर – मुसलमानों से लिया जाने वाला वैयक्तिक कर था।
जकात – मुसलमानों द्वारा अपने सम्पत्ति का कुछ हिस्सा दान करना जकात कहलाता है।
खम्स – लूट में प्राप्त धन खुम्स कहा जाता था।
उश्र – यह एक प्रकार का कृषि कर था।
गयासुद्दीन तुगलक का प्रसिद्ध चिश्ती संत निजामुद्दीन औलिया के साथ कटुतापुर्ण संबंध थे।
एक बार जब गयासुद्दीन बंगाल विजय अभियान पर गया, तब वहाँ से लौटते वक्त तुगलकी फरमान भिजवाया कि मेरे दिल्ली में प्रवेश के पूर्व ही निजामुद्दीन औलिया दिल्ली छोड कर चले जाये ,यह सुनकर निजामुद्दीन औलिया ने कहा था- “हनूज-ए-दिल्ली दूरस्थ” (अर्थात दिल्ली अभी दूर है) संयोग कुछ ऐसा रहा दिल्ली में प्रवेश करने से पहले सुल्तान जब अफगानपुर नामक गाँव में विश्राम कर रहा था, तो लकडी की छत गिर जाने के कारण सुल्तान की मृत्यु हो गयी और वह दिल्ली नहीं पहुँच सका।
इब्नबतूता के अनुसार, गयासुद्दीन की मृत्यु का कारण उसके पुत्र मोहम्मद बिन तुगलक (जौना खाँ) का षड्यंत्र था। ग्यासुद्दीन तुगलक को उस ही के द्वारा तुगलकाबाद में बनवाये गये कब्र में दफना दिया गया।
गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु
जब ग़यासुद्दीन तुग़लक़ बंगाल अभियान से लौट रहा था, तब लौटते समय तुग़लक़ाबाद से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अफ़ग़ानपुर में एक महल (जिसे उसके लड़के जूना ख़ाँ के निर्देश पर अहमद अयाज ने लकड़ियों से निर्मित करवाया था) में सुल्तान ग़यासुद्दीन के प्रवेश करते ही वह महल गिर गया, जिसमें दबकर मार्च, 1325 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी। इब्नबतूता के अनुसार गयासुद्दीन की हत्या उसके पुत्र जौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) द्वारा रचे गए षड्यंत्र के माध्यम से की गई। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ का मक़बरा तुग़लक़ाबाद में स्थित है।
दिल्ली का तुग़लक़ाबाद किला
दिल्ली का तुग़लक़ाबाद किला, जो अब पूरी तरह से खंडहर है, एक समय में तुग़लक़ वंश की शक्ति और पराक्रम का प्रतीक था। इसका निर्माण 1321 में तुग़लक़ वंश के पहले सुल्तान गयासुद्दीन तुग़लक़ ने करवाया था। इसकी भव्यता और विशालता के बावजूद, इसके पूरा होने के कुछ ही समय बाद, इसका परित्याग कर दिया गया था। किंवदंती है कि गयासुद्दीन तुग़लक़ एक शक्तिशाली किला चाहता था जो मंगोल हमले का सामना कर सके। इसलिए, सिंहासन पर बैठने के तुरंत बाद, उसने नगर-क्षेत्र पर काम करना शुरू कर दिया, और दिल्ली के सभी मजदूरों के लिए किले में काम करना अनिवार्य कर दिया।
उसी समय के आसपास, एक रहस्यवादी सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया, अपनी खानकाह (निवास स्थल) में एक बावड़ी बनवा रहे थे। मजदूर पूरा दिन किले में काम करते थे और रात में वे बावड़ी पर काम करते थे। इससे सुल्तान नाराज हो गया। उसने निजामुद्दीन की तेल की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि बावड़ी के निर्माण स्थल पर चिराग न जलाए जा सकें। इससे निजामुद्दीन औलिया क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी रहस्यमय शक्तियों का उपयोग कर कुंए के पानी को तेल में बदल दिया। उन्होंने तुग़लक़ाबाद को भी शाप देते हुए कहा, “या रहे उज्जर या बसे गुज्जर,” (या तो यह उजड़ जाएगा या यहाँ केवल खानाबदोश चरवाहे बस जाएंगे)।
किंवदंती यह कहती है कि जब गयासुद्दीन तुग़लक़ अपने बंगाल अभियान पर था, तब उसे पता चला कि मजदूरों ने उसके आदेशों की अवहेलना की और वे औलिया की पानी की टंकी (बावड़ी) पर काम कर रहे थे। वह इतना क्रोधित हुआ कि उसने अपने लौटने पर संत को दंड देने की कसम खाई। यह सुनकर, निजामुद्दीन औलिया ने शाप देते हुए कहा, “हनूज-ए-दिल्ली दूरस्थ” (दिल्ली अभी दूर है)। स्पष्ट रूप से अभिशाप लग गया। लौटते समय, बंगाल अभियान में गयासुद्दीन तुगलक की सफलता का सम्मान करने के लिए एक मंडप बनाया गया, जिसके ढह जाने से उसकी और उसके छोटे बेटे की मृत्यु हो गई।
कुछ लोग कहते हैं कि यह उसके और उसके दूसरे बेटे मुहम्मद बिन तुगलक, जिसका उपनाम ‘पागल राजकुमार’ रखा गया था, के बीच सियासी झगड़े के कारण हुआ था।
गयासुद्दीन, जिसने “पागल राजकुमार” को कभी भी पसंद नहीं किया, चाहता था कि उसका छोटा बेटा सिंहासन पर बैठे । कहानी यह है कि मोहम्मद बिन तुगलक, जो निजामुद्दीन औलिया का भक्त था, उत्तर प्रदेश के कारा में अपने पिता से मिला और उन्हें मारने की साजिश रची। इस प्रकार, सुल्तान दिल्ली कभी वापस नहीं आ पाया।
किला, जो वास्तव में कभी बसा ही नहीं, लगभग सुल्तान की मृत्यु के तुरंत बाद, आखिरकार अनौपचारिक ढंग से 1327 में छोड़ दिया गया। मोहम्मद बिन तुगलक की अपनी एक अलग किलेबंद शहर, जहाँपनाह, बनाने की भव्य योजनाएँ थीं, और बाद में, उसने राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित कर दिया।
निजामुद्दीन की दरगाह पर श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं और यह सबसे अधिक पूजनीय स्थलों में से एक है, जबकि तुग़लक़ाबाद खंडहर है। बावड़ी, जो अभी भी उपयोग में है, एक भूमिगत जल-स्रोत द्वारा भरती है और इसके पानी को पवित्र माना जाता है।
ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र ‘जूना ख़ाँ’, मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351 ई.) के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसका मूल नाम ‘उलूग ख़ाँ’ था।
राजामुंदरी के एक अभिलेख में मुहम्मद तुग़लक़ (जौना या जूना ख़ाँ) को दुनिया का ख़ान कहा गया है।
दिल्ली सल्तनत के सभी सुलतानों में मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) सर्वाधिक विद्वान एवं शिक्षित शासक था। वह खगोलशास्त्र, गणित एवं आयुर्विज्ञान सहित अनेक विधाओं में निपुण था।
सम्भवतः मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद तुग़लक़ सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था। अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे ‘स्वप्नशील’, ‘पागल’ एवं ‘रक्त-पिपासु’ कहा गया है।
बरनी, सरहिन्दी , निजामुद्दीन, बदायूंनी एवं फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने सुल्तान को अधर्मी घोषित किया गया है।
मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1354) :
गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद जौना खां मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा था। अलाउद्दीन ख़िलजी की भाँति अपने शासन काल के प्रारम्भ में उसने, न तो ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृति ली और न उलेमा वर्ग का सहयोग लिया, यद्यपि बाद में ऐसा करना पड़ा। उसने न्याय विभाग पर उलेमा वर्ग का एकाधिपत्य समाप्त किया। क़ाज़ी के जिस फैसले से वह संतुष्ट नहीं होता था, उसे बदल देता था। मुहम्मद तुगलक एक योग्य व्यक्ति था और उसने सब विषयों में उलेमाओं के आदेश स्वीकार करने से इंकार कर दिया। केवल चार कानूनी कर थे-खिराज, जकात, जजिया और खमसा। लेकिन मुहम्मद तुगलक ने उनके अतिरिक्त और भी कर लगाए थे। मुहम्मद तुगलक कोई अंधा धर्म-विश्वासी नहीं था और इसलिए उसने अपने पूर्ववर्तियों तथा उत्तराधिकारियों की अपेक्षा हिन्दुओं की भावनाओं के प्रति काफी सम्मान बरता। उसने सती प्रथा रोकने का प्रयत्न किया। उसने स्वतंत्र राजपूत रियासतों में हस्तक्षेप नहीं किया और उसका यह काम धर्मप्रचारक वर्ग को रुचिकर नहीं था। उसने धार्मिक गुरुओं को न्याय के शासन-प्रबंध पर एकाधिकार से वंचित कर दिया। उसने अपने को याचना का सबसे बड़ा न्यायालय बनाया और जब कभी वह मुफ्तियों से असहमत हुआ, उसने उनके विचार को ठुकरा दिया और अपने विचारानुसार काम किया। राज्य के कुछ ख्याति-प्राप्त अधिकारियों को न्यायिक शक्तियाँ दी गईं हालांकि वे काजी या मुफ्ती नहीं थे।
यह सल्तनत काल का सबसे विद्वान सुल्तान था। इसने सोने का सिक्का – दीनार (200ग्रेन), चांदी के सिक्के – अदली (167 ग्रेन ) तथा अन्य धातुओं के भी कई सिक्के जारी किये थे। इसे सिक्कों का राजकुमार कहा गया है।
इसने अल-सुल्तान जिल्ल-ए-अल्लाह (ईश्वर सुल्तान का समर्थक है) की उपाधि धारण की।
मुहम्मद बिन तुगलक ने इंशा-ए-महरु नामक पुस्तक की रचना की। मुहम्मद बिन तुगलक भारतीय इतिहास में पागल, सनकी, रक्त पिपासु आदि नामों से जाना जाता है। मुहम्मद बिन तुगलक के काल में दिल्ली सल्तनत का साम्राज्य सर्वाधिक विस्तृत था।
दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में मुहम्मद बिन तुगलक सर्वाधिक विलक्षण व्यक्तित्व वाला शासक था। वह अरबी एवं फारसी का महान विद्वान तथा ज्ञान – विज्ञान की विभिन्न विधाओं जैसे खगोलशास्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा, विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि विषयों में पारंगत था।
इसके शासन काल में 1333 ई. में अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता भारत आया था। सुल्तान ने उसका खूब स्वागत किया तथा दिल्ली का काजी नियुक्त किया। 1342 में इब्नबतूता सुल्तान के राजदूत की हैसियत से चीनी शासक तोगनितमुख के दरबार में गया। इस यात्री ने मुहम्मद बिन तुगलक के समय की घटनाओं का अपनी पुस्तक रेहला में उल्लेख किया है। 1341 ई. में चीनी सम्राट तोगनितमुख ने अपना राजदूत भेजकर मुहम्मद बिन तुगलक से हिमाचल प्रदेश के बौद्ध मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए अनुमित मांगी।
इब्नबतूता के अनुसार उस समय तुगलक साम्राज्य 23 प्रांतों में बंटा हुआ था। कश्मीर एवं आधुनिक बलूचिस्तान को छोडकर लगभग सारा हिंदुस्तान दिल्ली सल्तनत के नियंत्रण में था।
‘अमीर-ए-कोही’
मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि की उन्नति के लिए एक नए विभाग “दीवान – ए – अमीर- ए – कोही” की स्थापना की। इस विभाग का मुख्य कार्य कृषकों को प्रत्यक्ष सहायता देकर अधिक भूमि कृषि कार्य के अधीन लाना था। 60 वर्ग मील की भूमि का एक लंबा टुकड़ा इस कार्य के लिए चुना गया। भूमि पर कृषि सुधार किए गए और फसल चक्र के अनुरूप हेर-फेर के साथ विभिन्न फसलों की खेती की गई।
इस विभाग की स्थापना सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने कि इस विभाग का उद्देश्य कृषि को प्रोत्साहन देना व मलगुजारी व्यवस्था का ठीक तरह से प्रबंध करना था ।
इस विभाग का प्रमुख पदाधिकारी दीवान-ए-अमीर-कोही था। इसके अतिरिक्त मुहम्मद बिन तुगलक ने किसानों की सहायता के लिए अत्यंत कम ब्याज पर तकावी ऋण (सोनधर) भी उपलब्ध कराया। मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि के विस्तार के लिए फसल चक्र की योजना भी कार्यांवित की थी।
मालगुज़ारी अथवा भूमिकर, अत्यन्त प्राचीन काल से भारत में सरकार की आय का प्रमुख स्रोत रहा है। राज्य को भूमि की उपज का एक भाग कर के रूप में लेने का अधिकार है, यह सिद्धान्त भारत में सदा से सर्वमान्य रहा है। मौर्य, गुप्त आदि हिन्दू राजाओं के शासनकाल में भूमि की उपज का एक छठा भाग कर के रूप में लिया जाता था।
मध्यकाल में भूमिकर बहुधा मनमाने ढंग से बढ़ा दिया जाता था। अकबर ने मालगुज़ारी की दर भूमि की उपज का एक-तिहाई भाग निश्चित कर दी और समूचे मुग़ल शासन काल में यही दर वैध मानी जाती थी। परन्तु व्यवहार रूप में मालगुज़ारी की दर तथा मालगुज़ारी की वसूली की व्यवस्था में अनगिनत उलट-फेर होते रहते थे।
गयासुद्दीन तुगलक ने कृषकों की स्थिति में सुधार के लिए अनेक प्रयास किए। उसने लगान के रूप में उपज का 1/10 या 1/11 हिस्सा ही लेने का आदेश जारी कराया।
उसने ‘मुकद्दम’ तथा ‘खूतो’ को उनके पुराने अधिकार लौटा दिए। गयासुद्दीन ने लगान निश्चित करने में बटाई का प्रयोग फिर से प्रारंभ कर दिया, ऋणों की वसूली को बंद करवा दिया, भू-राजस्व की दर को कम किया तथा सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण करवाया।
सिंचाई हेतु नहर निर्माण कराने वाला गयासुद्दीन पहला शासक था।
सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
मुहम्मद तुगलक का शासनकाल क्रांतिकारी योजनाओं के लिए जाना जाता है, जिसमें उसकी प्रमुख योजना मुद्रा व्यवस्था से संबंधित थी। सुल्तान ने तांबे तथा इससे मिश्रित कांसे के सिक्के जारी किए, जिनका मूल्य तत्कालीन जारी चांदी के सिक्के के बराबर था, जिसे ‘सांकेतिक मुद्रा’ कहा गया। ऐसा प्रयोग करने वाला मुहम्मद बिन तुगलक भारत का पहला सुल्तान था। यह योजना बाजार में अव्यवस्था उत्पन्न होने के कारण असफल रही।
राजधानी दिल्ली से दौलताबाद
मुहम्मद तुगलक के प्रयोगों में एक सबसे महत्वपूर्ण था, राजधानी दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरी) ले जाना। मुहम्मद तुगलक द्वारा राजधानी परिवर्तन के विभिन्न कारण बताए गए हैं। बरनी के अनुसार साम्राज्य के केंद्र में होने के कारण देवगिरी को राजधानी बनाया गया।
1326 – 1337 ई. के बीच मुहम्मद बिन तुगलक ने कई प्रशासनिक प्रयोग किए । इन प्रयोगों का क्रम बरनी, फरिश्ता, इब्नबतूता, इसामी ने इस प्रकार बताया है –
1. राजधानी परिवर्तन (1326 ई.)
2. दोआब में कर वृद्धि
3. खुरासान अभियान
4. सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
5. करांचिल अभियान (1337 ई.)
1.राजधानी परिवर्तन :
इसने अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर दौलताबाद को बनाया। राजधानी परिवर्तन के बाद देवगिरी का नाम दौलताबाद रखा। राजधानी परिवर्तन के कारण अलग-2 विद्वानों ने अलग- अलग बताये हैं।
फरिश्ता के अनुसार – “सुल्तान दिल्ली की जनता को दण्ड देना चाहता था तथा उसने दिल्ली को जला दिया।”
इब्नबतूता के अनुसार – “दिल्ली के लोग सुल्तान को गाली भरे पत्र लिखते थे अतः उन्हें दण्डित करना चाहता था।”
मान्य मत – (I) मंगोल आक्रमण से दिल्ली की सुरक्षा।
(II) प्रभावी प्रशासन के लिये राजधानी का केन्द्र में होना आवश्यक था।
लेकिन दिल्ली की जनता के समर्थन न देने के कारण यह योजना असफल हुई तथा इसामी के अनुसार 4 वर्षों के बाद दिल्ली पुनः बसी। जबकि अन्य इतिहासकारों के अनुसार सुल्तान ने अगले ही वर्ष दिल्ली में पुन: बसने का अधिकार दे दिया।
इस योजना का एक लाभ यह हुआ कि उत्तर भारत की संस्कृति दक्षिण भारत में भी फैली। बहुत से सूफी व मुस्लिम संत दौलताबाद में ही बस गये तथा एक समन्वित संस्कृति में योगदान दिया।
राजधानी परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ, जिसने अंततः बहमनी साम्राज्य के उदय का मार्ग खोला।
डॉ मेहंदी हसन और प्रो. निजामी के अनुसार राजधानी बदली नहीं गई अपितु सुल्तान ने दो राजधानियाँ – दिल्ली और देवगिरी रखने का निश्चय किया।
2. में कर वृद्धि – (गंगा – यमुना) :
मुहम्मद बिन तुगलक ने दोआब क्षेत्र में भू राजस्व कर को बढ़ाकर 50% कर दिया।
इसी समय इस क्षेत्र के किसान अकाल से पीड़ित थे। किसानों का विद्रोह हुआ। इस विद्रोह को शांत करने के लिए तथा उत्पादन बढ़ाने के लिये मुहम्मद बिन तुगलक ने दीवान-ए-अमीर- कोही (कृषि विभाग) स्थापित किया। यह विभाग किसानों को उत्पादन बढ़ाने हेतु ऋण (तकावी / सोनधर) प्रदान करता था।
इसके अलावा यह विभाग कृषि भूमि के विस्तार, कृषि क्षेत्र में शस्यावर्तन प्रणाली (बदल-2 कर फसलों का उत्पादन ) तथा नकदी फसल उपजाने पर भी बल देना था।
मुहम्मद बिन तुगलक ने अकाल सहायता के लिये एक अकाल-संहिता बनाई तथा कृषि आय का अलग रजिस्टर तैयार करवाया। यहीं से अकाल नीति प्रारंभ हुई।
इस सब के बावजूद किसानों का विद्रोह समाप्त नहीं हुआ। दूसरी तरफ अधिकारियों के भ्रष्टाचार के कारण यह योजना असफल हुई तथा 3 साल में ही कृषि सुधार के लिये 70 लाख टंका ऋण बांटा गया तथा कृषि सुधार योजना बंद कर दी गयी।
3. अभियान (मंगोल क्षेत्र) :
इस योजना का उद्देश्य था – मंगोल आक्रमण की समस्या का समाधान करना।
साम्राज्य विस्तार के साथ-2 राज्य की आय को बढ़ाना। इस अभियान के लिये सुल्तान ने लाख से अधिक सैनिकों को भर्ती किया, उन्हें प्रशिक्षण दिया तथा 1 साल का अग्रिम वेतन सैनिकों को दिया। इसी दौरान खुरासान में राजनैतिक परिस्थितियां बदल गई अतः सुल्तान ने खुरासान अभियान की योजना को रद्द कर दिया और भर्ती किये सैनिकों को बर्खास्त कर दिया तो सैनिकों ने विद्रोह कर दिया।
खुरासान की सही भौगोलिक स्थिति के संदर्भ में मतभेद है। बरनी ने इसकी पहचान ईरान और फरिश्ता ने ईरान तुरान के रूप में की है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थान मध्य एशियाई (Central Asia) का ट्रांस आक्सियान क्षेत्र था। यह अभियान ट्रांसऑक्सियान के मंगोल शासक तरमाशरीन (1327 ईस्वी) और सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के मैत्री का परिणाम था। मध्य एशिया की राजनीति में एक शून्यता आ गई थी जिसका लाभ मोहम्मद बिन तुगलक उठाना चाहता था। इस योजना की पूर्ति के लिए सुल्तान ने एक विशाल सेना संगठित की, जिसमें लगभग 370000 सैनिक थे। इस सेना में दोआब के राजपूत और कुछ मंगोलों (Mongols) को सम्मिलित किया गया।
सेना को 1 वर्ष का अग्रिम वेतन दिया गया लेकिन सेना के कुछ करने से पहले ही मध्य एशिया की राजनीति में परिवर्तन हो गया। ट्रांसऑक्सियान अब ध्वस्त कर दिया गया और मिश्र और ईरान (Iran) में संधि हो गई, फलस्वरूप मुहम्मद बिन तुगलक को अपनी योजना त्यागनी पड़ी।
अधिकांश सेना भंग कर दी गई सेना के कुछ भाग को उत्तरी भारत की पर्वतीय श्रृंखला में सीमाओं को दृढ़ करने के लिए भेजा गया।
इस विशाल सेना पर काफी धन व्यय किया गया, इससे सेना की आर्थिक स्थिति दुर्बल हो गई सेना से निकाले गए सैनिकों ने भी असंतोष का वातावरण उत्पन्न किया।
अतः सुल्तान की योजना भी असफल रही इससे उसके प्रसिद्धि में कमी हुई
4. सांकेतिक मुद्रा – ( टोकन मनी का प्रचलन ) :
इस योजना का उद्देश्य इस प्रकार था – वैश्विक स्तर पर चांदी की कमी होने के कारण बाजार में चांदी के मूल्य के ताँबे (बरनी) , कांस्य (इब्नबतूता) अथवा पीतल (इसामी) के सिक्के जारी किये इसे ही सांकेतिक मुद्रा कहा गया, लेकिन सुल्तान द्वारा सांकेतिक मुद्रा चलाने से पूर्व प्रभावी निगरानी तंत्र स्थापित न करने तथा जनता व अधिकारियों के भ्रष्टाचार के कारण बाजार में नकली सिक्कों की बाढ़ आ गई तथा योजना असफल हो गई।
(मुहम्मद बिन तुगलक के पूर्व ईरान के शासक गेंखतू खाँ तथा चीन के मंगोल शासक कुर्बला खाँ ने भी सांकेतिक मुद्रा चलाई थी लेकिन भारत में तुगलक ने ही चलाई थी।)
5.करांचिल/ कराजल अभियान (कुमायूं हिमाचल, उत्तराखंड) (1337 ई.) :
इस अभियान का उद्देश्य कुमायूं क्षेत्र के छोटे-2 हिन्दू शासकों को सल्तनत में मिलाना था। यह क्षेत्र सल्तनत के विद्रोहियों के लिये शरण स्थली बना हुआ था।
इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर सुल्तान ने खुसरो मलिक के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी।
प्रारंभिक सफलता के बाद खुसरो मलिक सुल्तान की आज्ञा लिए बिना तिब्बत की ओर बड़ गया, जहां रास्ता भटक जाने और स्थानीय आक्रमण के कारण संपूर्ण सेना नष्ट हो गई।
भारत में सर्वप्रथम सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
मुहम्मद तुगलक ने अपने समय में विभिन्न प्रकार के सिक्के चलाए और उन सभी का उचित मूल्य निश्चित किया, परंतु सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन उसकी एक विशिष्टता रही।
बरनी के कथनानुसार खजाने में चांदी की कमी और साम्राज्य विस्तार की नीति को कार्य रूप में परिणत करने की वजह से मुहम्मद बिन तुगलक को सांकेतिक मुद्रा चलानी पड़ी। ईरान में गेंखतू खां के समय में सांकेतिक मुद्रा चलाई गयी थी, यद्यपि वहां यह प्रयोग असफल हुआ था।
परंतु चीन में कुबलई खां के समय में सांकेतिक मुद्रा का प्रयोग सफलतापूर्वक किया गया था। संभवतया नवीन अन्वेषणों का प्रयोग करने वाले मुहम्मद तुगलक ने उन देशों से प्रेरणा प्राप्त की। आधुनिक इतिहासकारों का यह भी कहना है कि उसके समय में संपूर्ण विश्व में चांदी की कमी हो गई थी और भारत में तो बहुत ही कमी थी, इस कारण उसने सांकेतिक मुद्रा चलाई।
मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा जारी स्वर्ण के सिक्कों को इब्नबतूता द्वारा ‘दीनार’ की संज्ञा दी गई थी। मुहम्मद बिन तुगलक अपनी सैन्य शक्ति में अभिवृद्धि के लिए तांबे के सिक्कों की टोकन मुद्रा जारी करना चाहता था न कि पश्चिम एशियाई देशों तथा उत्तरी अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार करने के लिए स्वर्ण का टोकन मुद्रा।
मुहम्मद बिन तुगलक के योजनाओं की असफलता के कारण –
सुल्तान की योजनाओं का उद्देश्य सही व दूरगामी था, लेकिन योजनाओं को सही तरीके से लागू न करने, अधिकारियों व जनता के असहयोग व भ्रष्टाचार के कारण उद्देश्य में अच्छी होते हुये भी असफल हो गयी। इससे राज्य को आर्थिक हानि हुई तथा विभिन्न वर्गों में विद्रोह भी पनपा जिसने दिल्ली सल्तनत के पतन को निर्मित कर दिया।
मुहम्मद बिन तुगलक ने उलेमाओं को प्रशासन में हस्तक्षेप से रोका इसके अलावा उनके विशेषाधिकारों को समाप्त किया तथा उन्हें भी न्याय की परिधि में ले आया (उलेमाओं को नियंत्रित किया)। मुहम्मद बिन तुगलक ने प्रशासन में भारतीय मुसलमानों के साथ-2 विदेशियों व हिन्दुओं को भी शामिल किया। इससे उलेमा नाराज हुये।
मुख्य हिन्दू अधिकारी :
रतन – राजस्व अधिकारी
पीरा-माली – राजस्व अधिकारी
साईराज, भीरूराम, धारा इक्तेदार थे।
प्रमुख अफगान अधिकारी : मलिक मख मलिक शाहू लोदी
विदेशी अधिकारी – इनमें विशेष रूप से खुरासानी थे। इन्हें सुल्तान प्यार से आइज्जा पुकारता था।
1333 ई. में इब्नबतूता को काजी के पद पर नियुक्त किया।
इब्नबतूता
इब्नबतूता का जन्म 24 फरवरी 1304 ई. को अफ्रीकी देश मोरक्को में हुआ था। इब्नबतूता का वास्तविक नाम शेख़ फ़तेह अब्दुल्लाह या मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह इब्नबतूता था। इब्नबतूता को सभी विदेशी मुस्लिम यात्रियों में सबसे महान माना जाता है। इब्नबतूता ने मक्का, ईराक़, ईरान, अफ़गानिस्तान होते हुए भारत की यात्रा की थी जिसमें उसे अनेक कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा था।
इब्नबतूता 1333 ई. में दिल्ली पहुंचे और उस समय वहां तुगलक वंश के शासक मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। मुहम्मद बिन तुगलक ने इब्नबतूता को दिल्ली का काज़ी बनाया था। काजी के पद पर इब्नबतूता लगभग 8 वर्षों तक रहे और अंत में उनको भ्रष्टाचार के आरोप में मुहम्मद बिन तुगलक ने जेल में डलवा दिया था। इब्नबतूता भारत में 14 वर्ष तक रहे।
1342 में मुहम्मद बिन तुगलक ने इब्नबतूता को अपना राजदूत बनाकर चीन भेजा था। इब्नबतूता की मृत्यु 1369 में मोरक्को के मराकेश शहर में हुई थी।
क़िताब उल रेहला ग्रन्थ :
क़िताब उल रेहला ग्रन्थ, को किताब ए रेहला अथवा केवल रेहला के नाम से भी जाना जाता है। रेहला ग्रन्थ की रचना अरबी भाषा में इब्नबतूता के द्वारा की गई थी। वैसे तो रेहला ग्रन्थ में इब्नबतूता की यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया गया है लेकिन इसमें सल्तनत कालीन इतिहास की जानकारी को भी विस्तृत रूप से बताया गया है। रेहला ग्रन्थ में सल्तनत काल की डाक व्यवस्था का भी विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है।
“राजा को प्रजा से मुक्ति मिली व उन्हें राजा से”
मुहम्मद बिन तुगलक जब दौलताबाद में था तभी तार्गी के नेतृत्व में गुजरात में एक विद्रोह हुआ। सुल्तान स्वयं इस विद्रोह को दबाने के गुजरात गया। तार्गी पराजित हुआ और भागकर सिंध चला गया। सुल्तान गुजरात में शांति-व्यवस्था स्थापित कर तार्गी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर रवाना हुआ।
मार्ग में ही सुल्तान बीमार पड़ा और थट्टा के निकट 20 मार्च, 1351 को उसकी मृत्यु हो गई। उसके निधन पर बदायूंनी ने लिखा है, “सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई।
डॉ॰ ईश्वरी प्रसाद ने उसके बारे में कहा है कि, “मध्य युग में राजमुकुट धारण करने वालों में मुहम्मद तुग़लक़, निःसंदेह योग्य व्यक्ति था। मुस्लिम शासन की स्थापना के पश्चात दिल्ली के सिंहासन को सुशोभित करने वाले शासकों में वह सर्वाधिक विद्वान एवं सुसंस्कृत शासक था।” उसने अपने सिक्कों पर “अल सुल्तान जिल्ल अल्लाह”, “सुल्तान ईश्वर की छाया”, सुल्तान ईश्वर का समर्थक है, आदि वाक्य को अंकित करवाया। मुहम्मद बिन तुग़लक़ एक अच्छा कवि और संगीत प्रेमी भी था।
फिरोज शाह तुगलक
फिरोज शाह तुगलक दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश का शासक था। वह दीपालपुर (हरियाणा) की हिंदू राजकुमारी का पुत्र था। उसने अपने शासन के दौरान कई हिन्दुओं को मुस्लिम धर्म अपनाने पर मजबूर किया।
उसने अपने शासनकाल में ही चांदी के सिक्के चलाये। फिरोजशाह तुगलक, मुहम्मद बिन तुगलक का चचेरा भाई एवं सिपहसालार ‘रजब’ का पुत्र था। उसकी माँ ‘बीबी नैला’ दीपालपुर के भाटी राजपूत शासक (राणामल) की पुत्री थी।
मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद 20 मार्च 1351 को फिरोजशाह तुगलक का राज्याभिषेक थट्टा के निकट हुआ। पुनः फिरोज शाह का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ। सुल्तान बनने के बाद फिरोजशाह तुगलक ने सभी कर्ज (लगभग 24) माफ कर दिए, जिसमें ‘सोनधर ऋण’ भी शामिल था, जो मुहम्मद बिन तुगलक के समय किसानों को दिया गया था।
फिरोज शाह तुगलक ने सामान्य लोगों की भलाई के लिए कुछ उपकार के कार्य किए।
नियुक्ति के लिए एक दफ्तर (रोज़गार दफ्तर) खोलकर तथा प्रत्येक मनुष्य के गुण एवं योग्यता की पूरी जांच-पड़ताल के बाद के यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को नियुक्ति देकर उसने बेकारी (बेरोजगारी) की समस्या को हल करने का प्रयास किया।
राजस्व व्यवस्था :
फिरोज तुगलक ने शरीयत द्वारा स्वीकृत 4 करों – खराज (लगान), जजिया (गैर-मुस्लिमों से वसूला जाने वाला कर), खम्स (युद्ध में लूट का माल), जकात (मुसलमानों से लिया जाने वाला कर) आदि को ही प्रचलन में मुख्य रूप से रखा।
सम्भवतः फिरोज तुग़लक़ के शासन काल में लगान उपज का 1/5 से 1/3 भाग होता था।
इसने सिंचाई कर हक-ए-शर्ब लगाया, जो सिंचित भूमि की कुल उपज का 1/10 था।
इसने सर्वप्रथम राज्य की आय का ब्यौरा तैयार करवाया।
फिरोज तुगलक ने शरीयत के अनुसार केवल 4 प्रकार के कर वसूले थे। (अपवाद सिंचाई कर), उसने खम्स के अनुपात को शरीयत के आधार पर वसूला तथा पहली बार ब्राह्मणों से भी जजिया (गैर मुसलमानों से लिया जाने वाला कर) कर वसूला।
फिरोजशाह तुगलक के समय की समस्या यें निम्नलिखित हैं –
1.किसानों का विद्रोह
2.उलेमा वर्ग, अमीर वर्ग, सैन्य वर्ग में असंतोष
3.राज्य का खाली खजाना
4.साम्राज्य का विघटन
फिरोज तुगलक ने इन समस्याओं का तात्कालिक समाधान ढूंढा व तुष्टीकरण की नीति अपनाई जिसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक व सैनिक भाग कमजोर हो गया, जो सल्तनत के पतन का कारण रहा।
फिरोजशाह तुगलक द्वारा समस्याओं का समाधान निम्नलिखित तरीकों से किया गया
1.किसानों के विद्रोह का समाधान –
फिरोज तुगलक ने किसानों के ऋणों को समाप्त कर दिया। इसके लिए उसने सल्तनत के मुशरिफ-ए- मुमालिक (महालेखाकार) से किसानों के ऋण रजिस्टरों को नष्ट करने का आदेश दिया।
दिल्ली की जनता को खुश करने के लिये ख़लीफ़ा से दो बार अपने पद की स्वीकृति (खिल्लत) प्राप्त की तथा अपने नाम से खुत्बा पढ़वाया और उसमें पूर्व के सभी शासकों (कुतुबुद्दीन ऐबक को छोड़-कर) का नाम भी पढ़वाया।
उसने जनता की सहानुभूति प्राप्त करने के लिये कठोर दंड को मानवीय बनवाया तथा राज्य के विद्रोहियों को माफी दी। इनमें मुहम्मद बिन तुगलक के वजीर ख्वाजा-ए-जहाँ भी शामिल था।
2.अमीरों व सैनिक तथा उलेमा वर्गों में असंतोष का समाधान –
फिरोज तुगलक ने अमीरों को संतुष्ट करने के लिये सैनिक व असैनिक पदों को वंशानुगत बना दिया।
पिता के बाद उसके पद पर पुत्र स्थापित होता था तथा पुत्र न हो तो दामाद तथा दामाद भी न हो तो दास को नियुक्त किया जाता था। परिणामतः सैनिक और प्रशासनिक दक्षता में कमी आयी। फिरोज तुगलक ने प्रशासन में भ्रष्टाचार को भी प्रेरित किया। फिरोज तुगलक ने उलेमाओं का सहयोग पाने के लिये कट्टर धार्मिक नीति अपनाई, उलेमाओं को विशेषाधिकार पुन: प्रदान किये तथा न केवल शरीयत को प्रशासन का आधार घोषित किया बल्कि व्यवहार में भी उसे लागू किया। ऐसा करने वाला वह सल्तनत का पहला शासक था। फिरोज तुगलक ने इसलिए भी कट्टर धार्मिक नीति अपनाई, क्योंकि उसकी मां भी राजपूत थी तथा उसके सुल्तान बनने पर उलेमा वर्ग फिरोज तुगलक को शंका की दृष्टि से देखते थे।
फिरोज तुगलक ने एक ब्राह्मण को भी प्राणदंड दिया तथा नगरकोट के मंदिर को नष्ट किया। प्रशासन में हिन्दुओं को शामिल करना अत्यंत सीमित कर दिया गया।
उलेमाओं को प्रसन्न करने के लिये उसने मुस्लिम महिलाओं के पीरों की मजार जाने पर पाबंदी लगायी।
पर्दा प्रथा को प्रोत्साहन दिया तथा अनेक मस्जिदों व मदरसों का निर्माण करवाया।
3. राज्य के खाली खजाने का समाधान –
इसके लिये फिरोज तुगलक ने बंजर भूमि के कृषि – विकास पर बल दिया तथा इससे प्राप्त होने वाली आय को धार्मिक कार्यों पर खर्च करना निश्चित किया। फिरोज तुगलक ने कृषि के विकास के लिये सतलज व यमुना से अनेक नहरें बनवाई। इनमें उलूग खानी, राजवाही नहरें प्रमुख थी। इन नहरों से दिल्ली , हरियाणा तथा आस-पास के क्षेत्रों में सिंचाई का विकास हुआ। हांसी, सिरसी, दिल्ली जैसे क्षेत्रों में सिंचाई बढ़ी।
फिरोज तुगलक ने हालांकि 23 प्रकार के करों को समाप्त कर दिया जिनका शरीयत में उल्लेख नहीं था, केवल 4 ही कर वसूले – खराज (भू राजस्व कर), खम्स, जजिया, जकात। इनके अलावा कर के रूप में हक – ए – शर्ब (सिंचाई कर) जो कृत्रिम सिंचाई (नहरों से होने वाली सिंचाई) का 1/10 भाग था।
इसी प्रकार फिरोज तुगलक ने फलों के 1200 बगीचे लगाये तथा फलों के निर्यात पर बल दिया। वह अंगूर का शौकीन था तथा अलग-2 किस्म के अंगूर के बगीचे लगवाये।
उसने 36 प्रकार के कारखानों की स्थापना की। इन कारखानों में वेतन भोगी गुलामों को नियुक्त किया। सल्तनत काल में कारखानों का सर्वाधिक विकास इसी के काल में हुआ था।
• कारखानों की स्थापना मुहम्मद बिन तुगलक के समय में हुईं थी तथा विकास फिरोज तुगलक के काल में हुआ था।
4. साम्राज्य विघटन की समस्या का समाधान –
फिरोजशाह तुगलक एक अच्छा सेनानायक नहीं था, अतः उसने बंगाल (आर्थिक महत्व के कारण) के अलावा स्वतंत्र हुए क्षेत्रों को पुन: जीतने की कोशिश नहीं की।
उसने अपने जीवन काल में कुल 4 अभियान किये 2 बंगाल के विरुद्ध 1353 ई. में इलियासशाह के काल में तथा 1359 ई. में सिकंदर शाह के काल में। इन दोनों के काल में राजधानी पंडुआ थी, जिसमें एक इकदला नामक किला था, जिसमें दोनों शासकों ने शरण ली।
बंगाल के दूसरे अभियान से लौटते समय फिरोज तुगलक ने उडिसा के गंग शासक पर जाजपुर (उडिसा) में आक्रमण कर उसे लूटा तथा उत्तर प्रदेश में जौनपुर नामक नगर की स्थापना की और इस नगर का नाम जौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) के नाम पर रखा।
तीसरा अभियान 1360-61 में नगरकोट पर किया तथा ज्वालामुखी मंदिर पर लूटपाट कर मंदिर को नष्ट कर दिया तथा मंदिर में स्थित पुस्तकालय के संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया। इनमें प्रमुख ग्रंथ था दलालत- ए- फिरोजशाही (यह ग्रंथ दर्शन व नक्षत्र विज्ञान से संबंधित फारसी में अनुवाद हैं।)
सिंध के शासक जैमवबानिया के विरुद्ध 1362 ई. में युद्ध किया । इस अभियान के दौरान फिरोज तुगलक की सेना रास्ता भटक गई। बाद में तुगलक के वजीर खान-ए-जहां-मकबूल द्वारा सहायता भेजने पर फिरोज तुगलक द्वारा सिंध के शासक पर नाममात्र की अधीनता स्वीकार करवाई।
फिरोज तुगलक द्वारा निर्मित नगर –
इसने स्थापत्य कला के विकास पर भी बल दिया तथा इसके लिए उसने दीवाने-इमारत नामक नया विभाग स्थापित किया। इस विभाग द्वारा अनेक मदरसों (प्राथमिक शिक्षण), मकतबों (उच्च शिक्षण) का निर्माण हुआ इस विभाग द्वारा तुगलक ने कुतुबमीनार की मरम्मत करवाई।
Note : इल्तुतिमश द्वारा निर्मित नासीरिया मदरसा; हौज – ए – शम्सी की मरम्मत फिरोज तुगलक ने करवाई थी। इसके साथ ही अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित हौज – ए – खास की मरम्मत भी फिरोज तुगलक ने ही करवाई थी।
फिरोज तुगलक ने अनेक नगरों का निर्माण करवाया जैसे – फिरोजपुर, फतेहाबाद, फिरोजाबाद, हिसार (हरियाणा) – फिरोजा, जौनपुर। इसके काल में दो प्रमुख स्थापत्यविद थे- मलिक-ए-सहना तथा इसी का शिष्य अहमद।
दासों के निर्यात पर पाबंदी –
फिरोज तुगलक ने दासों के निर्यात पर पाबंदी लगाई। सल्तनत काल में सर्वाधिक दास लगभग 4,80,000 दास फिरोज तुगलक के अधीन थे तथा दासों की देखभाल के लिये इसने दीवाने – बंदगान नामक विभाग की स्थापना की थी।
मुस्लिम लोगों के कल्याण के लिये उठाये गये कदम –
फिरोज तुगलक ने मुस्लिम लोगों के कल्याण के लिये अनेक कदम उठाये जैसे- उसने दीवाने-खैरात नामक विभाग स्थापित किया, जो गरीब मुसलमानों को आर्थिक सहायता प्रदान करता था, तथा उनकी बेटियों का विवाह करवाता था।
• दीवाने – इस्तिहाक (पेंशन) – यह विभाग असहाय व अनाथ मुसलमानों को पेंशन देता था।
• रोजगार दफ्तर – बेरोजगार मुस्लिम लोगों को रोजगार दिलाने में सहायता प्रदान करता था।
• दारूल – शफा (खैराती अस्पताल) – इसमें मुस्लिमों का मुफ्त में उपचार कराया जाता था।
कुछ इतिहासकार फिरोज तुगलक को सल्तनत काल का अकबर भी कहते हैं। आधुनिक इतिहासकारों ने फिरोज तुगलक को कल्याणकारी निरंकुश/ काल का शासक बताया हैं।
फिरोज तुगलक ने अपनी आत्मकथा फुतुहात-ए-फिरोजशाही लिखी थी।
फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु –
1388 ई. में फिरोज तुगलक की मृत्यु के बाद तुगलक वंश का पतन हो गया और उसका पौत्र तुगलकशाह गयासुद्दीन द्वितीय के नाम से शासक बना, जिसके पश्चात अनेक कमजोर शासक हुये जो क्रमानुसार इस प्रकार हैं – अबूबक्र – मुहम्मदशाह – हुमायुं – अलाउद्दीन सिकंदरशाह – नसीरुद्दीन महमुद (अंतिम तुगलक शासक)
नासिरुद्दीन महमुद के समय 1398 ई. में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। सुल्तान गुजरात भाग गया तथा तैमूरलंग ने दिल्ली को लूटा। जाते समय तैमूर ने पंजाब क्षेत्र पर अपने अधिकारी खिज्र खां को स्थापित किया।
कमजोर तुगलक उत्तराधिकारियों के समय तुगलक सल्तनत का विघटन प्रारंभ हो गया। कुछ विद्रोहियों ने विद्रोह कर कई क्षेत्रों को स्वतंत्र कर लिया जो इस प्रकार हैं –
• 1389 ई. में मलिक-उल-शर्क ने जौनपुर में विद्रोह कर दिया।
• 1407 ई. में दिलावर खाँ सूरी ने मालवा में विद्रोह कर दिया।
• 1407 ई. में जाफर खाँ (मुजफ्फरशाह) ने गुजरात में विद्रोह कर उसे स्वतंत्र करा लिया था।
• 1413 ई. में नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु हो गई तथा कुछ महीनों के लिये दौलत खाँ नामक अफगान ने दिल्ली पर शासन किया , जिसे खिज्रखां ने पराजित कर सैयद वंश की स्थापना की।
फिरोज शाह तुगलक की विशिष्टता
फिरोज शाह तुगलक की विशिष्टता यह थी कि उसने अपने पूर्ववर्ती राजाओं और कुलीन पुरुषों के भवनों की मरम्मत कराने एवं उन्हें पुनः निर्मित कराने पर बहुत ध्यान दिया।
उसने अपने निर्माण से भी अधिक महत्व उन भवनों को पुनः स्थापित करने में दिया।
उसके द्वारा अशोक के दो स्तंभों को मेरठ एवं टोपरा (अब अम्बाला जिले में) से दिल्ली लाया गया।
टोपरा वाले स्तंभ को महल तथा फिरोजाबाद की मस्जिद के निकट पुनः स्थापित कराया गया। मेरठ वाले स्तंभ को दिल्ली के वर्तमान बड़ा हिंदू राव अस्पताल के निकट एक टीले कश्के शिकार या आखेट-स्थान के पास पुनः स्थापित कराया गया।
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में जो ‘अशोक स्तंभ’ लगा हुआ है, वह गांव टोपरा कलां से ही ले जाया गया था। इतिहासकार डॉ. राजपाल ने बताया कि सम्राट अशोक ने गुजरात की गिरनार की पहाड़ियों में इस स्तंभ को बनवाया था, जिसकी लंबाई 42 फीट व चौड़ाई 2.5 फीट है। इस स्तंभ पर प्राचीन ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में लिखी गई उनकी सात राजाज्ञाएं खुदी हुई हैं। देश का यह एकमात्र स्तंभ है, जिस पर सात राजाज्ञाएं खुदी हुई हैं। 1453 में फिरोजशाह तुगलक जब टोपरा कलां में शिकार के लिए आया तब उसकी नजर इस स्तंभ पर पड़ी।
पहले वह इसे तोड़ना चाहता था, लेकिन बाद में इसे अपने साथ दिल्ली ले जाने का मन बनाया। इस बात का वर्णन इतिहासकार श्याम ए सिराज ने तारीक -ए -फिरोजशाही में किया है। यमुना के रास्ते इस स्तंभ को दिल्ली ले जाने के लिए एक बड़ी नाव तैयार की गई।
स्तंभ पर कोई खरोंच न पड़े इसके लिए उसे रेशम व रुई में लपेट कर ले जाया गया। डॉ. राजपाल ने बताया कि टोपरा से यमुना नदी तक इसे ले जाने के लिए 42 पहियों की गाड़ी तैयार की गई थी, जिसे आठ हज़ार लोगों ने खींचा था।
18वीं शताब्दी में सबसे पहले एलेग्जेंडर कनिंघम ने साबित किया था कि यह स्तंभ टोपरा कलां से लाया गया है। उसके सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पहली बार ब्राह्मी लिपि में लिखे संदेश को पढ़ा था।
दिल्ली सल्तनत के तुगलक राजवंश का अंतिम शासक
नासिर-उद्-दीन महमूद (1394-1412 ई.) तुगलक वंश का अंतिम शासक था। इसके शासनकाल में ख्वाजा जहां ने जौनपुर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। पंजाब का सुबेदार खिज्र खां स्वतंत्र होकर दिल्ली को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा। फिरोज के एक अन्य पुत्र नुसरत शाह ने नासिरुद्दीन को चुनौती दी। फलस्वरूप तुगलक वंश दो भागों में विभाजित हो गया और दोनों शासकों ने एक ही साथ दिल्ली के छोटे से राज्य पर शासन किया।
नासिरुद्दीन दिल्ली में रहा और नुसरत शाह फिरोजाबाद में। नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में मध्य एशिया के महान मंगोल सेनानायक तैमूर ने भारत पर आक्रमण (1398 ई.) किया। यह कथन इसी शासक के लिए प्रचलित था-‘शहंशाह की सल्तनत दिल्ली से पालम तक फैली हुई है।
“तैमूर के आक्रमण से डरकर दोनों सुल्तान राजधानी से भाग गये। 15 दिन तक दिल्ली में रहने के पश्चात तैमूर वापस चला गया और खिज्र ख़ाँ को अपने विजित प्रदेशों का राज्यपाल नियुक्त किया। एक मान्यता के अनुसार तैमूर आक्रमण के बाद दिल्ली सल्तनत का विस्तार सिमट कर पालम तक ही रह गया था।
तैमूर के वापस जाने के पश्चात् महमूद तुग़लक़ ने अपने वजीर मल्लूइकबाल की सहायता से पुन: दिल्ली सिंहासन पर अधिकार कर लिया, पर कालान्तर में मल्लूइकबाल मुल्तान के सुबेदार खिज्र ख़ाँ से युद्ध करते हुए मारा गया। मल्लूइकबाल के मरने के बाद सुल्तान ने दिल्ली की सत्ता एक अफगान सरदार दौलत ख़ाँ लोदी को सौंप दी।
1412 ई. में महमूद तुग़लक़ की मृत्यु हो गई। 1413 ई. में दिल्ली सिंहासन के लिए दौलत ख़ाँ लोदी एवं खिज्र ख़ाँ ने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार कर एक नये राजवंश “सैय्यद वंश” की स्थापना की।
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